अक्टूबर 17, 2018

संगम युग

Sangam Yuga/Period and Sangam Literature in Ancient History
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संगम युग

संगम एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ ‘सभा’ होता है । किन्तु तमिल इतिहास में इसका अर्थ साहित्यिक अकादमी से था । तमिल कवियों ने विशाल संगम साहित्य की रचना की ।

  • प्रथम संगम का आयोजन मदुरै में अगस्त्य ऋषि की अध्यक्षता में हुई । द्वितीय संगम का आयोजन कपाटपुरम (अलवै) में हुई ।
  • द्वितीय संगम का उपलब्ध ग्रंथ तोल्कापियम है जो तमिल व्याकरण पर आधारित है । तृतीय संगम का आयोजन उत्तरी मदूरा में नक्कीरर की अध्यक्षता में हुई ।
  • तृतीय संगम के तीन निम्नलिखित संग्रह उपलब्ध है-
  • पत्थुपात्तू:- इसमें 10 काव्य है जो मुख्यतः राजाओं को समर्पित हैं ।
  • पदिनेनकलिकनक्कु :- इसमें 48 संग्रह है ।
  • एत्तुथोकइ :- यह तमिल साहित्य में सर्वाधिक गौरवशाली कृति है ।
  • तृतीय संगम काल में तीन महाकव्यों – शिल्पदिकरम, मणिमेखलय तथा जीवन चिन्तामणी की रचना हुई । ये महाकव्य इसप्रकार हैं –
  • शिल्पदिकरम :- इसे संगम साहित्य का ‘इलियॅड’ कहा जाता है ।
  • मणिमेखलय:- इसे संगम साहित्य का ‘ओडिसी’ कहा जाता है । इसमें बौद्ध धर्म से संबंधित विवरण है ।
  • जीवन चिन्तामणी :- यह संगम साहित्य का महत्वपूर्ण महाकव्य है ।

 

  • सर्वाधिक प्रसिद्ध देवता ‘मुरूगन’ थे जिन्हें ‘सुब्रह्ण्यम’ भी कहा जाता है । मुर्गा को मुरूगन का प्रतीक माना जाता है । विष्णु का तमिल नाम ‘ तिरुमल’ है ।
  • संगमकालीन शासन राजतंत्रात्मक था । संगम काल में किसी भी स्त्री शासिका के होने का प्रमाण नही मिलता है । सभा या मनरम एक न्यायिक संस्था थी जिसमें गांव के लोग सम्मिलित होते थे । गांव की छोटी सभा को अवाई कहा जाता था । संगम काल में ‘वेल्लाल’ एक सम्पन्न कृषक थे ।
  • संगम काल में ‘सती प्रथा’ प्रचलित थी । इस काल में दास प्रथा का उल्लेख नही मिलता है । सती की देवी “कन्नगी” थी । पत्नी पूजा इन्ही से संबन्धित थी ।
  • उरैयूरसूती वस्त्र एवं कपास व्यापार का सर्वाधिक प्रसिद्ध स्थल था । मोरपक्षी का सर्वाधिक निर्यात रोमन देश को किया जाता था । ‘मा’ का अर्थ भूमि को मापने से था ।

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